- Uncategorized

यह डिजिटल युग है

प्रतिदिन विचार :

यह डिजिटल युग है
इस डिजिटल युग में जब हर व्यक्ति, ब्रांड या सेवा खुद को एक पहचान देना चाहता है, तब लोकप्रियता प्राप्त करने का मार्ग केवल तकनीकी दक्षता या रचनात्मकता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह अब इस बात पर भी निर्भर करता है कि आपका विचार, सेवा या कंटेंट उस क्षेत्र की संस्कृति से कितनी गहराई से जुड़ता है। समाज की सांस्कृतिक पहचान जिसमें उसकी भाषा, परंपराएं, जीवनशैली, त्योहार, रीति-रिवाज और स्थानीय मान्यताएं शामिल हैं, किसी भी विचार की स्वीकार्यता के लिए निर्णायक तत्व होती हैं। यही कारण है कि आज अनेक कंटेंट क्रिएटर, स्टार्टअप, सेवाएं और सामाजिक आंदोलन अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उस क्षेत्र की सांस्कृतिक भाषा, प्रतीकों और सोच को अपने कंटेंट में सम्मिलित कर रहे हैं।
एक यूट्यूबर जो अपनी स्थानीय बोली में वीडियो बनाता है, या एक सामाजिक कार्यकर्ता जो प्रचार सामग्री में लोककला और परंपरागत प्रतीकों का उपयोग करता है, वह अधिक प्रभावी सिद्ध होता है, क्योंकि वह जनता से आत्मिक जुड़ाव स्थापित करता है। केवल विचार का अच्छा होना पर्याप्त नहीं, वह विचार उस समुदाय की सामूहिक चेतना से मेल खाता है या नहीं, यही उसकी सफलता का मूल आधार बनता है। भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में, क्षेत्रीय भाषाएं, पहनावे और मूल्य अलग-अलग होते हैं, और यही कारण है कि जो सेवाएं, ब्रांड या विचार इन विविधताओं को सम्मान देते हुए आगे बढ़ते हैं, उन्हें ही समाज का व्यापक समर्थन प्राप्त होता है।
वैश्विक कंपनियां भी आज ‘लोकलाइजेशन’ की रणनीति अपना रही हैं, वे केवल अंग्रेजी में नहीं, बल्कि हिंदी, तमिल, मराठी, पंजाबी, डोगरी, मैथिली जैसी भाषाओं में विज्ञापन बना रही हैं, स्थानीय त्योहारों पर विशेष छूट दे रही हैं, और सोशल मीडिया पर स्थानीय जन-भावनाओं से मेल खाने वाला कंटेंट प्रकाशित कर रही हैं। जैसे ही कोई विचार या सेवा ‘हमारी भाषा में’, ‘हमारे पर्वों के साथ’, ‘हमारी जीवनशैली को ध्यान में रखकर’ प्रस्तुत होती है, तो लोग उसे केवल जानकारी या सुविधा के रूप में नहीं देखते, बल्कि वह उनकी अपनी चीज बन जाती है। इसी तरह, डिजिटल कंटेंट का क्षेत्र भी तेजी से ‘हाइपर लोकल’ हो रहा है। चाहे वह इंस्टाग्राम रील्स हो, यूट्यूब शॉट्र्स या फेसबुक पोस्ट, वह कंटेंट जो स्थानीय जीवन से मेल खाता है, लोगों को अपनी रोजमर्रा की कहानियों से जोड़ता है, वह तुरंत वायरल हो जाता है।
इसके अलावा, कंटेंट में स्थानीय व्यंजन, बोली, पहनावा और रीति-रिवाजों का समावेश न केवल लोकप्रियता बढ़ाता है, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का कार्य भी करता है। सामाजिक अभियानों के लिए भी यह सामंजस्य अत्यंत आवश्यक है। सामाजिक स्वीकृति का आधार भी यही है कि विचार को ‘हमारा’ समझा जाए, न कि ऊपर से थोपा हुआ। यही कारण है कि विज्ञापन से लेकर नीति-निर्माण तक, हर क्षेत्र में अब सांस्कृतिक जुड़ाव को प्राथमिकता दी जा रही है। यह केवल मार्केटिंग की रणनीति नहीं, बल्कि सामाजिक प्रभाव की अनिवार्यता बन चुकी है। यही कारण है कि जब कोई शिक्षक अपने छात्रों को उनकी बोली में समझाता है, तो वह अधिक प्रभावी बनता है। जब कोई हेल्थकेयर वर्कर किसी ग्रामीण महिला को उसकी सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप स्वास्थ्य परामर्श देता है, तो वह अधिक विश्वसनीय माना जाता है।
आज के दौर में ‘सोशल इन्फ्लुएंसर’ बनने का मार्ग केवल तकनीक या मनोरंजन तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कृति की गहराइयों से जुडक़र ही उसका दीर्घकालिक प्रभाव संभव है। उदाहरणस्वरूप, एक कंटेंट निर्माता जो उत्तर भारत में रहता है, यदि वह अपनी बात को ब्रज, अवधी या कुमाऊंनी जैसी स्थानीय बोलियों में प्रस्तुत करता है, और साथ ही लोकगाथाओं, देवी-देवताओं, क्षेत्रीय व्यंजनों या मेलों का संदर्भ देता है, तो वह शहरी और ग्रामीण दोनों दर्शकों से सहजता से जुड़ता है। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले का आयुष ठाकुर कलाकार स्थानीय भाषा में कॉमेडी करता है और लाखों फॉलोअर्स उसके कंटेंट्स को पसंद करते हैं। बिलासपुर का ‘हिमाचली मुंडा’ भी अपनी ग्रामीण परिवेश की जटिल व्यवस्था को स्थानीय भाषा में जनमानस तक पहुंचाने का सजग प्रयास करता है और लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय है। मध्यप्रदेश के एक यूट्यूबर ने ‘मालवी व्यंग्य’ की शैली में शॉर्ट वीडियो बनाए, उसके लाखों फॉलोअर्स केवल उसकी प्रस्तुति से नहीं, बल्कि उसकी क्षेत्रीय अभिव्यक्ति से जुड़ गए।
एक डिजिटल ऐप जो किसानों को मौसम की जानकारी देता है, यदि वह उनके त्योहारों, कृषि चक्र और बोली को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया हो, तो वह केवल तकनीक नहीं, एक सामाजिक साथी बन जाता है। इसी प्रकार, शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापन स्थानीय कहावतों, उदाहरणों और खेलों से हो।

श्री राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)

संपर्क  9425022703        

rakeshdubeyrsa@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *