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स्वदेशी’ का विचार कांग्रेस के जन्म से पहले

प्रतिदिन विचार:

स्वदेशी’ का विचार कांग्रेस के जन्म से पहले
अमरीका के हठी रुख के कारण देश के केंद्र द्वारा स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया गया है। आह्वान एक महत्वपूर्ण उद्घोष है, ताकि अमरीका की कुत्सित आर्थिक नीतियों को गांधीगिरी से माकूल जवाब दिया जा सके। स्वदेशी का अर्थ है ‘अपने देश में निर्मित वस्तुओं का उपयोग करना और विदेशी वस्तुओं के उपयोग से बचना।’ इसका उद्देश्य ग्राम या देश के अधिकतम लोगों द्वारा बनाई गई वस्तुओं को खरीदना और इस्तेमाल करना होता है, जिससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो और विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता कम हो। साधारण शब्दों में, स्वदेशी का अर्थ है अपने देश की चीजों का समर्थन करना और विदेशी चीजों से बचना। इस विचार को मुख्यत: स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतीयों में बढ़ावा दिया गया था ताकि विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार से देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके।
वर्ष 1905 के बंग-भंग विरोधी जनजागरण से स्वदेशी आंदोलन को बहुत बल मिला। यह 1911 तक चला और गांधी जी के भारत में पदार्पण के पूर्व सभी सफल आंदोलनों में से एक था। अरविंदो घोष, रवींद्रनाथ ठाकुर, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय स्वदेशी आंदोलन के मुख्य उद्घोषक थे। आगे चलकर यही स्वदेशी आंदोलन महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन का भी केन्द्र-बिन्दु बन गया। राष्ट्रपिता ने इसे ‘स्वराज की आत्मा’ कहा था। ‘स्वदेशी’ का विचार कांग्रेस के जन्म से पहले ही दे दिया गया था।
जब 1905 ईस्वी में बंग-भंग हुआ, तब स्वदेशी का नारा जोरों से अपनाया गया। उसी वर्ष कांग्रेस ने भी इसके पक्ष में मत प्रकट किया। देशी पूंजीपति उस समय मिलें खोल रहे थे, इसलिए स्वदेशी आंदोलन उनके लिए बड़ा ही लाभदायक सिद्ध हुआ। भारत में स्वदेशी का पहले-पहल नारा बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1872 ईस्वी में ही विज्ञानसभा का प्रस्ताव रखते हुए दिया था। उन्होंने कहा था, ‘जो विज्ञान स्वदेशी होने पर हमारा दास होता, वह विदेशी होने के कारण हमारा प्रभु बन बैठा है, हम लोग दिन-ब-दिन साधनहीन होते जा रहे हैं। अगस्त 1905 में कलकत्ता के टाउनहॉल में एक विशाल बैठक आयोजित की गई जिसमें स्वदेशी आंदोलन की औपचारिक घोषणा की गई। मैनचेस्टर में निर्मित कपड़ों तथा लिवरपूल के नमक जैसे सामानों के बहिष्कार का संदेश प्रचारित किया गया।
स्वदेशी आंदोलन का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा, जिससे न केवल ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार को बढ़ावा मिला, बल्कि स्वदेशी उद्योगों और राष्ट्रीय शिक्षा को भी प्रोत्साहन मिला। स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय उद्योगों को बढ़ावा दिया, जिससे कपड़ा मिलें, साबुन और माचिस की फैक्टरियां, चमड़े के कारखाने, बैंक, बीमा कंपनियां और दुकानें स्थापित हुईं। क्या यह अब हमारे लिए जरूरी नहीं है। स्वदेशी आंदोलन के परिणामस्वरूप, राष्ट्रीय शिक्षा परिषद की स्थापना की गई और बंगाल नेशनल कॉलेज और देश भर में कई राष्ट्रीय स्कूल और कॉलेज खोले गए। स्वदेशी आंदोलन ने विदेशी वस्तुओं, विशेष रूप से कपड़ों, चीनी, नमक और विलासिता की वस्तुओं का बहिष्कार किया, जिससे उनकी बिक्री में कमी आई। क्या इस तरह के आंदोलन की आज जरूरत नहीं है? अमेरिकी बॉस की भारत को आर्थिक तौर पर नुकसान पहुंचाने वाली हरकतों के संदर्भ में प्रधानमंत्री द्वारा स्वदेशी का आह्वान यदि पूरे देश मे एक आंदोलन का रूप ले ले तो अमरीकी हितों को एक बड़ा झटका लगेगा, स्वदेशी हमारी दीर्घकालीन आर्थिक नीति का आवश्यक हिस्सा होना चाहिए, देश का नीति आयोग इस पर ध्यान दे। हमें स्वदेशी साधनों के उपयोग पर बल देना चाहिए। आज के दौर में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता की जरूरत फिर से महसूस होने लगी है। विकसित देश उन्हीं के होते हैं, जिनमें स्वदेशी उत्पादों का उत्पादन होता है। यदि हम दूसरे देशों पर निर्भर रहेंगे, तो वे हमें मजबूरी में ऊंचे दाम पर चीजें बेचेंगे और हमें उन्हें खरीदने की आवश्यकता होगी। स्वदेशी आंदोलन, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा, आज आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने का आधार बन चुका है। यह आंदोलन न केवल आर्थिक स्वावलंबन को बढ़ावा देता है, बल्कि राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करता है। हर भारतीय को स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की जरूरत है, क्योंकि यह देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने, रोजगार सृजन करने और वैश्विक मंच पर भारत की स्थिति को मजबूत करने का मार्ग प्रशस्त करता है।

श्री राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)

संपर्क  9425022703        

rakeshdubeyrsa@gmail.com

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