प्रतिदिन विचार :
बोर्ड ऑफ ( मोहताज) पीस
अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने जिस ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (शांति बोर्ड) की स्थापना का प्रयास किया है, उसमें अभी तक वे 19 देश शामिल हुए हैं, जो अमरीका की चापलूसी करने को बाध्य हैं। अलग-अलग कारणों से अमरीका के मोहताज हैं। अमरीका ही उन्हें सुरक्षा की गारंटी देता है और वह ही आर्थिक मदद करता है। उन 19 में से 12 देश इस्लामिक हैं। उनमें पाकिस्तान ने भी ‘शांति बोर्ड’ की सदस्यता के लिए दस्तखत किए हैं। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जब प्रारूप पर दस्तखत किए, तो सीडीएफ आसिम मुनीर भी सामने बैठे थे। अब इस फैसले के खिलाफ पाकिस्तान में ‘जेहाद’ के नारे बुलंद किए जा रहे हैं। इसके कुछ खास कारण हैं।
पाकिस्तान अभी तक इजरायल को एक देश के तौर पर मान्यता नहीं देता। वह फिलिस्तीन का समर्थक रहा है, लेकिन अब पाकिस्तान के 4000 फौजियों को गाजा क्षेत्र में इजरायल सेना के नेतृत्व में काम करना पड़ेगा। ट्रिगर इजरायल के हाथ में होगा और लडऩे-मरने वाले मुस्लिम फौजी होंगे। पाकिस्तान के मुस्लिम फौजियों को फिलिस्तीन, गाजा, हमास के मुसलमानों पर ही गोली चलानी पड़ेगी। जाहिर है कि मुसलमान ही मुसलमान का कत्ल करेगा! अहम और बुनियादी कारण यह है कि इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने संसद को विश्वास में क्यों नहीं लिया? संसद की इजाजत के बिना इतना अहम फैसला कैसे ले लिया गया कि पाकिस्तान के 4000 फौजी गाजा में सक्रिय रहेंगे। उन्हें जो 1000 डॉलर प्रति का मेहनताना मिलेगा, वह 40 लाख डॉलर की राशि सीडीएफ आसिम मुनीर हासिल करेगा। फौजियों को जो देना होगा, वह हुकूमत तय करेगी। फौजी की मौत के बाद पर्याप्त मुआवजा और सम्मान राशि कितनी होगी और कौन देगा, यह अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। उस पर भी मुनीर की ‘डकैत निगाहें’ होंगी! पाकिस्तान में कट्टरपंथी जमात इसे ‘इस्लाम-विरोधी’ और ‘अल्लाह-विरोधी’ फैसला करार दे रही है।
खासकर सीडीएफ मुनीर के खिलाफ फतवे जारी किए जा रहे हैं। अवाम का मानना है कि शहबाज-मुनीर ने राष्ट्रपति टं्रप के सामने दंडवत आत्मसमर्पण कर दिया है, क्योंकि पाकिस्तान को पैसा चाहिए। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान को कर्ज देने से इंकार कर दिया है। चीन अपने उधार दिए गए कर्ज को वापस मांग रहा है। यदि आईएमएफ और विश्व बैंक से आर्थिक पैकेज की अपेक्षा करनी है,तो अमरीका ही एकमात्र सहारा है। राष्ट्रपति टं्रप के इशारे पर ही पाकिस्तान को नया कर्ज मिल सकता है। पाकिस्तान पर फिलहाल 130 अरब डॉलर के करीब का कर्ज है। पाकिस्तान के हरेक नागरिक पर औसतन 3,63,831 पाक रुपए का कर्ज है। करीब 60 फीसदी अवाम गरीबी-रेखा के नीचे जीने को विवश है। भारत से करीब 25 गुना अधिक महंगाई पाकिस्तान में है। अवाम में जेहाद के नारों के साथ ‘मुनीर की वर्दी उतारने’ के नारे भी गूंज रहे हैं। ‘तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान’ सरीखा संगठन भडक़ उठा है और आत्मघाती हमलों की धमकियां दे रहा है। फिलहाल ‘शांति बोर्ड’ की सदस्यता निशुल्क है, लेकिन स्थायी सदस्यता के लिए 1 अरब डॉलर की फीस अदा करनी होगी। भारत की मौजूदा मौद्रिक स्थिति के मुताबिक, यह राशि 9100 करोड़ रुपए से अधिक बनती है। पाकिस्तान को अधिक राशि का भुगतान करना पड़ेगा। ‘घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने’…भूखा-नंगा पाकिस्तान इतनी रकम कैसे दे पाएगा? यानी सब कुछ अस्थायी है अभी। यदि विश्व-व्यवस्था के संदर्भ में इस ‘शांति बोर्ड’ का विश्लेषण करें, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी और वीटोधारक सदस्य देशों में से सिर्फ अमरीका ही सदस्य है। रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन समेत भारत, जर्मनी, इटली, कनाडा, नॉर्वे, डेनमार्क, स्वीडन, पराग्वे, स्लोवेनिया, तुर्किये, यूक्रेन आदि देश न तो बोर्ड से जुड़े हैं और न ही ट्रम्प के निमंत्रण का जवाब दे रहे हैं।

श्री राकेश दुबे (वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार)
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