प्रतिदिन :
जनता की नजर में “दल बदल” से बड़ा पाप है “निष्ठा बदल”
फडनवीस सरकार गिर गई महाराष्ट्र में, यह तो उस समय ही समझ में आने लगा था, जब मेल-बेमेल समीकरण बनने लगे थे, अब उध्दव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री होंगे | यह प्रक्रिया अभी भी नहीं रुकी है, सदन में बहुमत सिद्ध करना पड़ेगा, जो अब इस कहावत सा हो रहा है “जाट मरा तब जानिए जब तेरहीं हो जाये” | एक कहावत और है “तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा” | कहावतें कुछ भी कहती हो प्रजातंत्र में जिस तरह की सरकार चुनने की प्रक्रिया है, भारत के संविधान में जिसका वर्णन है और जो देश की मान्य परम्परा है, यहाँ सब कुछ उससे अलग है | उत्तरपूर्व के कुछ राज्यों के बाद गोवा, कर्नाटक से चली हवा महाराष्ट्र तक पहुँच कर संविधान को तार-तार कर रही है | दिल्ली को मध्यप्रदेश के कुछ चेहरों से परहेज था, इस कारण मध्यप्रदेश में वर्तमान सरकार है, नही तो जादुई आंकड़ा भाजपा के पक्ष में होता | कुल मिलाकर संविधान कुछ भी कहे भारतीय राजनीति में “गॉड फादर” सबसे उपर थे,हैं और रहेंगे | महाराष्ट्र ने साबित कर दिया है | फ़िलहाल जिस व्यक्ति को सबसे ज्यादा लाभ हुआ है, वो अजित पवार है और सबसे ज्यादा ठगा महाराष्ट्र का मतदाता महसूस कर रहा है | अजित पवार पर को क्लीन चिट मिल गई है, जनता को अंदेशा है सरकार मिलेगी पर मालूम नहीं कब तक चलेगी |
इस सारे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात गठ्बन्धन है | सारे दल इसे भले ही पवित्र कह रहे हो, पर तकनीकी दृष्टि से यह दलबदल है, जिस गठ्बन्धन को सबसे ज्यादा सीटें मिली वो टूट गया और विचार भिन्न जमावड़ा सरकार बन गई | संविधान के अनुच्छेद १०२(२) और अनुच्छेद १९१ (२)(१)में वर्णित उपबन्धों के आधार पर निरर्हता के दायरे में सबसे पहले अजित पवार ही आते हैं | दल ने उन्हें नेता पद से हटा दिया, वो चिठ्ठी जो राजभवन को सौंपी गई थी उसकी वैधता पर प्रश्नचिंह है, लेकिन इस सबसे होता क्या है ? ‘गॉडफादर’ ने हुकुम देकर बुला लिया, जीजा जाकर साले को मना लाये | कोई बड़ी बात नहीं है, आने वाले दिनों में आप उन्हें पुन: उसी कुर्सी पर देखें | भाजपा को छोड़ बाकी के लिए तो वे पहले भी पवित्र थे | अब तो भाजपा में स्नान के बाद संघ की विभूति भी उनके मस्तक पर लग गई है | समय आ गया है “दल बदल” से अधिक “निष्ठा बदल” रोकने का | निष्ठा बदल तो सीधा उस मतदाता से विश्वास घात जिसने आपको एक विशेष विचार के कारण चुना था | आपके बदलते चोलों से समाज में कोई अच्छा संदेश नहीं गया है | आम प्रतिक्रिया है कि “शेर घास खाने लगा है |”
इन अपवित्र गठबन्धनोंकी शुरुआत भाजपा ने की हो या कांग्रेस ने या अब शिवसेना कर रही हो | “निष्ठाबदल” के खेल के पुराने खिलाडी तो शरद पवार ही हैं | उनके भतीजे उनसे दो कदम आगे निकले, शरद पवार ने सालों में निष्ठा बदल की थी, अजित पवार ने घंटों और फिर मिनटों का रिकार्ड बना दिया है | कांग्रेस और एन सी पी के २ उप मुख्यमंत्री विभागों की खींचतान के समाचार आने लगे हैं | इस सब में महत्वपूर्ण जन कल्याण की प्राथमिकता सबसे पीछे दिख रही है | सता का चरित्र कमोबेश सारे दलों में एक सा होता जा रहा है | चुनाव पूर्ण गठ्बन्धन नहीं टिक रहे तो चुनाव पश्चात बनते समीकरणों का कौन मान रखेगा ? बड़ा सवाल है | वे वादे और अजेंडे नेपथ्य में चले गये हैं जिनके आधार पर वोट मांगे गये थे | स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए अब कोई गुंजाईश नहीं दिखती सारे के सारे दल निष्ठां बदल हो गये हैं | फिर भी आनेवाली सरकार कुछ नया करे इस हेतु शुभकामना |



